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शिकवा-ए-हुसैन - सलमान रिज़वी सिरसिवी


🌹🌹🌹"शिक़वा-ए-हुसैन"🌹🌹🌹

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शब्बीर दे रहे हैं सदा हाले दिल सुनाऊँ,
आओ तुम्हें मैं मक़सदे इंसानियत बताऊँ,
चौदह सौ साल पहले की फिर करबला दिखाऊँ,
घर बार लुट रहा है जहाँ तुमको लेके जाऊँ,

सर काटने को ज़ुल्म के खंजर सवार हैं...
आले नबी के खून के प्यासे हज़ार हैं...

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जो है ख़ुदा की चाह वही मेरी चाह है,
उसपर चलो जो दीने मुहम्मद की राह है,
इस बात का तो सारा ज़माना गवाह है,
भूकी है तीन रोज़ की प्यासी सिपाह है,

अपने लिये तो कुछ भी नहीं कर रहे हैं हम...
इस्लाम की बक़ा के लिये मर रहे हैं हम...

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चलती हैं तेज़ दश्त में तीरों की आँधियाँ,
अकबर का खून पीने को बेकल हैं बरछियाँ,
दिल है हमारा फरज़ो मुहब्बत के दरमियाँ,
लेकिन हमें ये सोच के देना है इम्तेहाँ,

क़ल्बे रसूले हक़ में न कोई क़लक़ रहे...
अकबर मेरा रहे न रहे दीने हक़ रहे...

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क़ासिम का लाशा होता है पामाल होने दो,
रुसवा रसूले हक़ की हुयी आल होने दो,
बच्चे हैं सारे प्यास से बेहाल होने दो,
मक़तल हमारे ख़ूँ से हुआ लाल होने दो,

बैयत के हर सवाल की तरदीद के लिये...
सर देंगे हिफ़्ज़े कलमा ए तौहीद के लिये...

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पामाल क़ल्बे लैला की है आरज़ू तो क्या,
ज़ैनब हुयी है दश्त में बे आबरु तो क्या,
नावक से छिद गया है पिसर का गुलू तो क्या,
बेशीर के लहू से किया है वुज़ू तो क्या,

आईना हमने दीने नबी का दिखा दिया...
इंसानियत को फ़ख़्र से जीना सिखा दिया...

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खुद को जो कह रहे हो अज़ादारे शाहे दीं,
इस बात का हमें भी दिलाओ तो कुछ यकीं,
सजदों के नूर से जो मुनव्वर नहीं जबीं,
दिल में हमारे आपकी ख़ातिर जगह नहीं,

तोड़ो न क़ल्बे ज़हरा मेरे दिल को तोड़के...
आओ न मजलिसों में मुसल्लों को छोड़के...

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आते हैं हम भी देखने उठते हुए अलम,
बनते हैं बेनमाज़ी अलमदार बा हशम,
मन्ज़र वो सोच सोचके होता है हमको ग़म,
क्या इनके वास्ते ही हुए थे शहीद हम,

करते हैं ऐसे लोग जो मातम मेरा बपा...
लगता है जैसे काट रहा है कोई गला...

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झगड़े फ़साद आज रवाँ अंजुमन में हैं,
मजलिस में वाह वाही की रस्में चलन में हैं,
अमराज़े बेहयायी बहुत मर्दो ज़न में हैं,
लगता है जैसे तीर अभी भी बदन में हैं,

हमको जो दर्द देते हैं आमाल मत करो...
फिर से हमारे जिस्म को पामाल मत करो...

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है आपके तरीक़ा ए मातम में इख़्तेलाफ़,
आप एक के ख़िलाफ़ हैं एक आपके ख़िलाफ़,
दिल से करो ये बुग्ज़ो अदावत की गर्द साफ़,
होता है ऐसी बातों क़ल्बे नबी शिगाफ़,

रस्मों रिवायतों की रवानी में मत बहो...
आपस की फूट ख़त्म करो मुत्तहिद रहो...

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होती हैं मेरी याद में जो शब बेदारियाँ,
करते हैं सारी रात मेरा ज़िक्र मदह ख़ाँ,
अज्रो सवाब इनका तुम्हें देगी मेरी माँ,
लेकिन ये बात क़ाबिले अहसास है यहाँ,

मक़सद से क्यूँ हमारे फ़रामोश होते हो...
वक़्ते नमाज़ होते ही घर जाके सोते हो...

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फ़रशे अज़ा पे इतना तो रक्खा करो ख़्याल,
ज़हरा यहाँ पे आती हैं बिखराये अपने बाल,
माएँ शरीक होती हैं उजड़े थे जिनके लाल,
हंसते हो और करते हो मक़सद को पायमाल,

तफ़रीह और मज़ाक़ का नक़्शा बना दिया...
मजलिस को तुमने खेल तमाशा बना दिया...

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माहे अज़ा को रस्मों रिवायत समझ लिया,
मनमानियों को तुमने शरीयत समझ लिया,
बस रोने को ही अज्रे रिसालत समझ लिया,
मजलिस को मेरी अपनी विरासत समझ लिया,

करते हो मेरा ज़िक्र अगर नाम के लिये...
तय्यार रहना हश्र में अंजाम के लिये...

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नारे जो अलअजल के लगाते हो बार-बार,
करता है कोई ऐसे भी मौला का इंतेज़ार,
मक़सद से मेरे दूर हो गफ़लत के हो शिकार,
लश्कर में कैसे मेहदी के हो आपका शुमार,

लिल्लाह तुम फ़रेब की राहों को छोड़ दो...
हमसे है प्यार गर तो गुनाहों को छोड़ दो...

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उल्फ़त है तुमको हमसे मगर मारेफ़त नहीं,
तो ताज़ियाना समझो इसे ताज़ियत नहीं,
ये ज़ुल्म है हमारे लिये मरहमत नहीं,
ऐसी हुसैन वालो की होती सिफ़त नहीं,

मक़सद हमारा क्या है ज़रा फ़िक़्र फिर करो...
पहले मुझे समझ लो मेरा ज़िक्र फिर करो...

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"सलमान" तुम भी अपने फरीज़े को जान लो,
कोई भी हक़ की बात कहे उसको मान लो,
इस्लाह अपने नफ़्स की करनी है ठान लो,
किरतास पर लिखो ये बसद आन बान लो,

हो शायरी तो दीन के पैग़ाम के लिये...
वरना तो काम और भी हैं नाम के लिये...

✍🏻 "सलमान रिज़वी सिरसिवी"

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*#Being Hussaini Mission#*