जिन्नात की हाज़री
पैग़म्बर नौगांवी
भारत में आप किसी दरगाह या मज़ार में चले जाइए आपको दो चार नफ़सियाती मरीज़ ऐसे ज़रुर मिल जाऐंगे जो हाज़री के नाम पर उछल कूद और उठा पटख़ करते हुए उस दरगाह या मज़ार का तक़ददुस पामाल कर रहे होंगे, हाज़री का यह तरीक़ा सूफ़ियों का है, सूफ़ियों के यहाँ जब अक़ीदतमंद आते हैं तो सूफ़ी उनके हाथ में कलावा (नाड़ा) बांध कर कहते हैं कि जाओ पीर साहब की क़ब्र पर हाज़री दो, वह अक़ीदतमंद अपने आप को उसी कलावे से पीर साहब की क़ब्र की जाली से बांध लेता है और हाज़री देने लगता है और झूम झूम कर अजीबो ग़रीब हरकतें करता है और अगर पीर की क़ब्र पर क़व्वालियाँ हो रही होती हैं तो फ़िर यह अक़ीदतमंद ज़मीन में लोटने लगता है, मध्य प्रदेश के रतलाम ज़िले में हुसैन टीकरी में इमाम हुसैन (अ0स0) और हज़रत अब्बास (अ0स0) वग़ैरा के रौज़ों की शबीहें बनी हुई हैं, जिसका सारा इन्तज़ाम अहले सुन्नत के हाथ में होता है, लेहाज़ा अहले सुन्नत इन्तज़ामिया ने तमाम ज़ायरीन से रौज़ों में मज़कूरा सूफ़ियों के तरीक़े पर हाज़री दिलवाई, जिसके बाद से पूरे भारत की शिया दरगाहों पर वबा की तरह हाज़रियाँ फ़ैल गईं और फ़िर इसमें लोगों ने अपनी मरज़ी से इज़ाफ़े करने शुरु कर दिये, कुछ औरतों को मैंने ख़ुद यह कहते हुए सुना है किः दरगाह पर 11 छल्ले बांधने से हाज़री शुरु होजाती है, 11 का अदद अहले सुन्नत में अबदुल क़ादिर जीलानी की मुनासबत से मुक़ददस समझा जाता है जबकि शियों में 11 के अदद की कोई मुनासबत नहीं है, इसी से मालूम होता है कि यह अहले सुन्नत का तरीक़ा है जो हुसैन टीकरी (जावरा) से शिया दरगाहों तक पँहुचा है और अब तो दरगाहों पर 100-100 रु0 रोज़ पर बेरोज़गार लोग मालदारों की तरफ़ से हाज़री पर बैठे हुए देखे जा सकते हैं जो सारी उछल कूद वैसी ही करते है जैसी सूफ़ियों के यहाँ राइज है। इसी से इस हाज़री की हक़ीक़त का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है।
हाजरी की इल्मी तारीफ़ तो कोई नहीं बताता बस जितने मुंह उतनी बातें होती हैं जिसका ख़ुलासा यह है कि जो जिन किसी पर आजाता है उस को वह साहिबे मज़ार अपनी करामत से हाज़िर करा देता है और नफ़सियाती मरीज़ जो कुछ बड़बड़ाता है उसे जिन्नात की ज़बान समझा जाता है, जबकि अल्लाह तआला ने जिन्नात के जिस्म और आवाज़ का परदा रखा है यानी हम इन्सान न उनको देख सकते हैं और न उनकी आवाज़ सुन सकते हैं, लेकिन अम्बिया और आइम्मा अलैहेमुस्सलाम जिन्नात को देख भी सकते हैं और उनकी आवाज़ भी सुन सकते हैं, नहजुल बलाग़ा के क़ुतब ए क़ासेआ में हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैंः मैंने नुज़ूले वही के वक़्त शैतान की चीख़ की आवाज़ सुनी थी और अर्ज़ की थीः या रसूल अल्लाह! यह चीख़ कैसी है ? तो फ़रमायाः कि यह शैतान (जिन) है जो आज अपनी इबादत से मायूस हो गया है, तुम वह सब देख रहे हो जो मैं देख रहा हूँ और वह सब सुन रहे हो जो मैं सुन रहा हुँ, मक़ातिल की किताबों में लिखा है कि रोज़े आशूर जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने सदाए इस्तग़ासा बुलंद की तो ज़ाफ़रे जिन अपना लश्कर लेकर आगया था लेकिन इमाम हुसैन अलैहिस्स्लाम ने उसे वापस भेज दिया, ज़ाफ़रे जिन को सिर्फ़ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने देखा और उस से बातचीत की, अगर आम इन्सान भी जिन की आवाज़ें सुन लिया करते या जिनों को देख लिया करते तो यज़ीदी लश्कर भी जिनों के लशकर को देख कर भाग खड़ा होता, हमने र्क़ुआन व हदीस और इस्लामी तारीख़ व कलचर में बहुत तलाश किया मगर कहीं भी जिन्नात की हाज़री या उसका ज़िक्र नहीं मिला, सीरते नबावी व सीरते आइम्मा का मुतालेआ किया कहीं कोई वाक़ेआ ऐसा न देखा जिसमें हज़ूर सरकारे रिसालतमआब (स0अ0) याआइम्मा (अ0स0) की खि़दमत में किसी ऐसे शख़्स को लाया गया हो कि जिस पर जिन्नात का असर था और मासूमीन अलैहेमुस्सलाम ने उन जिन्नात को हाज़िर किया हो और जिन्नात बड़बड़ाए हों या बुरी बातें की हों या गालियाँ दी हों?! आलमें इस्लाम में आज भी मुसलमान जिन्नात की इस तरीक़ाए हाज़री से नावाक़िफ़ हैं जो हिन्दुस्तान में राइज है, हिन्दुस्तान में जिस तरह काली के मंदिर में हाज़री आती है इसी तरह मज़ारों और दरगाहों पर भी आती है जिस से मालूम होता है कि हाज़री का यह तरीक़ा इस्लामी नहीं है बल्कि ढोंगी बाबाओं ने पैसा कमाने के लिए यह तरीक़ा ईजाद किया है, अगर जिन्नात की ऐसी हाज़री में ज़रा भी सच्चाई होती तो मक्का, मदीना, कर्बला, नजफ़, शाम, क़ुम और मशहद के मुक़ददस मज़ारों में भी ऐसी हाज़रियाँ आया करतीं, इन हाज़रियों ने हिन्दुस्तान के मुस्लिम समाज में नफ़रतों के ऐसे बीज बोए हैं जिस से क़रीबी रिश्तेदारियों तक में दरारें आ गई हैं, मिसाल के तौर पर अगर कोई औरत इस बात को बर्दाश्त नहीं करती कि उसका शौहर अपने बहन भाईयों से ख़ुशगवार ताअल्लुक़ात रखे तो वह किसी भी मशहूर दरगाह में शौहर के साथ जाकर ख़ामोशी से ऐसे शख़्स को जो हाज़री में बड़बड़ा रहा होता है पैसे देकर हाज़री के दौरान शौहर को मुख़ातब कराके यह कहलवा देती है कि तुम्हारे बहन भाईयों ने तुम पर और तुम्हारे बीवी बच्चों पर बहुत सख़्त जादू कराया है और कभी कभी यह भी होता है कि शौहर के भाई बहनों के नाम तक बता देती है, अब जब बेचारा शौहर अजनबी शख़्स से अपने भाई बहन का नाम हाज़री में सुनता है तो बीवी के मकर की तरफ़ ध्यान भी नहीं जाता बल्कि उस पर यक़ीन कर के अपने भाई बहन से नाता तोड़ लेता है, दरगाहों में हाज़री पर बैठे लोगों का जब मुतालेआ किया गया तो इस बेहूदा हाज़री के चंद असबाब सामने आऐः मसलन इनमें कुछ तो निखटटू निकम्मे होते हैं जो अहलो अयाल की ज़िम्मेदारियों से फ़रार करते हुऐ दरगाहों में पनाह लेते हैं और वहाँ पड़े रहने का जवाज़ हाज़री या पेशी को बताते हैं और जब ऐसे लोगों से घर चलने को कहा जाता है तो कहते हैं कि अभी हमारा केस फ़ाइनल नहीं हुआ, ऐसे लोग दरगाह और साहिबे दरगाह दोनों को बदनाम करते हैं और अपने आप को धोखा देते हैं, कुछ वह होते हैं जो पुलिस से बच कर दरगाह मे आजाते हैं और हाज़री में मश्ग़ूल हो जाते हैं, कुछ इशक़िया शादी करना चाहते हैं मगर रिश्तेदार नहीं होने देते तो घर वालों को परेशान करने के लिए हाज़री पर बैठ जाते हैं, कुछ औरतें वह होती हैं जो सुसराल में सताई जाती हैं और उनका जब बस नहीं चलता तो वह हाज़री शुरु कर देती हैं, ऐसे अफ़राद का इलाज डा0 हज़रात इस तरह करते हैं कि पेट में नाक के ज़रिए पाइप डाल देते हैं जिस से पेट बिलकुल ख़ाली होजाता है और भूख बहुत ज्यादा लगने लगती है और इसी के साथ साइपोन सीरप दिया जाता है जो भूख को और भी बढ़ा देता है उधर कुछ खाने पीने को भी नहीं देते जिस से ऐसे अफ़राद एक ही दिन में घुटने टेक देते हैं और डा0 को सच सच बता देते हैं कि उन्होंने यह नाटक क्यों किया था, लेकिन हाज़री का एक सबब शीज़ो फ़िरीनिया नाम की बीमारी भी होती है, इस का मरीज़ हक़ीक़त से बचता है और उसके ख़्यालात हक़ीक़त पर ग़ालिब आजाते हैं यानी अगर ऐसे मरीज़ के ख़्याल में यह बात आजाऐ कि उस पर उसके किसी अज़ीज़ ने जादू कराया है तो बस यही ख़्याल उसके नज़दीक हक़ीक़त बन जाता है और ऐसा मरीज़ अपने उस रिश्तेदार से नाता तोड लेता है और ढोंगी बाबा ऐसे बीमार की बीमारी से ख़ूब फ़ायदा उठाते हैं, डॉक्टरों का कहना है कि यह बीमारी ज़्यादा टेंशन से हाती है क्योंकि इंसान के दिमाग़ के पिछले हिस्से Subconscious Mind में सारा टेंशन जमा होता रहता है और जब यह बहुत ज़्यादा होजाता है तो इस से Impulses निकलती रहती हैं और Impulses सेरिबरम में आती हैं जिसका असर इन्सान के जिस्म पर पड़ने लगता है और जब यह असरात नाक़ाबिले बर्दाशत हो जाते हैं तो इन्सान के काम काज और बरतावे में तबदीली आने लगती है और फ़िर और ज़्यादा होने पर जिस्म का कंट्रोल उसके क़ाबू से बाहर हो जाता है, फ़िर चाहे ऐसा मरीज़ अपना सर दीवारों से टकराए या सर के बल चलने लगे या बहुत ज़्यादा सरो सीना पीटने लगे उसे कोई एहसास नहीं होता मरीज़ की ऐसी हरकतों को ढोंगी बाबा दलील के तौर पर पेश करते हैं और कहते हैं कि अगर सच मुच हाज़री नहीं है तो चोट क्यों नहीं लगती जबकि ऐसा आदमी न तो नाटक कर रहा होता है और ना ही उस पर जिन्नात की हाज़री होती है बलकि यह नफ़सियाती झटका होता है जिस को डॉक्टर साईकिलोजिकल ट्रामा कहते हैं और जब तीमारदार ऐसे मरीज़ को किसी झाड़ फ़ूँक करने वाले के पास ले जाते हैं तो जिन उतारने के नाम पर मरीज़ की ख़ूब पिटाई की जाती है जिस से मरीज़ और बदतर होजाता है आम तौर पर ऐसा मरीज़ बेतुकी बातें करने लगता है जिसे ढोंगी बाबा खुली हाज़री कहते हैं और कभी बिलकुल ख़ामोश रहने को पसंद करता है तो उसको गुम हाज़री का नाम दिया जाता है और जब बैठ नहीं पाता तो खड़ी हाज़री कहते हैं और अगर चलने फ़िरने सेे घबराता है तो बैठी हाज़री कहने लगते हैं---1967 में मिस्र्र के हुकमरान जमाल अब्दुलनासिर जब इज़्राईल से जंग हार गऐ तो उन्हें इतनी टेंशन हुई कि नारकोटिक इंजक्शन देने के बावजूद 15 दिन तक न सो सके और हार्ट अटैक हो जाने से उनकी मौत हो गई अगर ढोंगी बाबा उनकी यह हालत देख लेते तो इसको भी जिन्नात की हाज़री कह देते और दलील यह देते कि अगर जिन्नात की हाज़री नहीं है तो नींद का इंजेक्शन देने के बावजूद 15 दिन से सोऐ क्यों नहीं! ढोंगी बाबाओं नें जिन्नात की हाज़री पर आस्था का कवर चढ़ाया है जिस से समाज के बा असर पढ़े लिखे और मालदार घराने भी इसके चक्कर में पड़ जाते हैं और यह लोग हाज़री के नाम पर कई कई हफ़्ते तक घर बार छोड़ कर दरगाहों में रहते हैं। जो इस्लाम मुसलमानों को यह इजाज़त नहीं देता कि वह ज़िंदगी के काम काज और घर बार छोड़ कर इबादत के लिए मसजिद में जा बैठें तो वह आस्था के नाम पर कारोबारे ज़िंदगी छोड़ कर दरगाहों में पड़े रहने पर किस तरह राज़ी रहेगा? लेहाज़ा हमें इस तरह की हाज़री के चक्कर में न पड़ना चाहिए। मुहम्मदी इस्लाम इसकी इजाज़त नहीं देता है । अल्लाह हम सबको इस ख़ुराफ़ात से महफ़ूज़ रखे (आमीन)
*वज़ाहत*
मेरे मज़मून *"जिन्नात की हाज़री"* में *ज़ाफरे जिन का करबला में रोज़े आशूर नुसरते इमाम (अ) में आने वाला वाक़ेआ* मोतबर नहीं है क़ारेईन नोट फ़रमा लिजीए।
पैग़ंबर नौगांवी