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हज़रत अली फरमाते हैं

हज़रत अली फरमाते हैं........

(1) तुम्हारा अछा वक़्त दुनिया को बताता है कि तुम कौन हो।
और तुम्हारा बुरा वक़्त तुम्हे बताता है कि दुनिया क्या है।
(हज़रत अली)
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(2) दौलत मिलने पर लोग बदलते नहीं है।
बल्कि बेनक़ाब हो जाते है।
(हज़रत अली)
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(3) जब तुम्हारी जान को ख़तरा हो तो सदक़ा देकर जान बचाओ।
और जब तुम्हारे ईमान को ख़तरा हो तो अपनी जान देकर ईमान बचाओ।
(हज़रत अली)
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(4) कभी अपने दोस्त की सच्चाई का इम्तिहान न लो।
क्या पता उस वक़्त वो मजबूर हो और तुम एक अच्छा दोस्त खो दो।
(हज़रत अली)
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(5) अगर कोइ तुमको सिर्फ अपनी ज़रूरत के वक़्त याद करता हो तो परेशान मत होना।
बल्के फ़ख्र करना के उसको अँधेरे मे रौशनी की ज़रूरत हे, और वह रौशनी तुम हो।
(हज़रत अली)
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(6) अपनी किस्मत पे वो रोता है,
जो अल्लाह के सामने सज़्दों में नहीं रोता।
(हज़रत अली)
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(7) ये दुनिया कितनी अजीब है,
ईमानदार को बेवकूफ, बेईमान को अक़लमंद और बेहया को खूबसूरत कहती है।
(हज़रत अली)
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(8) अपनों को हमेशा अपना होने का ऐहसास दिलावो,
वर्ना वक़्त आपके अपनों को आपके बग़ैर जीना सिखा देगा।
(हज़रत अली)
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(9) इन्सान अपनी ज़िन्दगी में हर चीज़ के पीछे भागेगा।
मगर दो चीज़ें उसके पीछे भागेगी।
एक उसका रिज्क़ और दूसरी उसकी मौत।
(हज़रत अली)
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(10) ज़िन्दगी के हर मोड़ पर सुलह करना सीखो।
क्योंकी झुकता वही है जिसमे जान होती है
और अकड़ना तो मुर्दे की पहचान होती है।
(हज़रत अली)
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(11) अगर दुनिया बेहतरीन जगह होती तो
यहाँ कोई रोता हुआ पैदा न होता।
(हज़रत अली)
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(12) झूट की सबसे बड़ी सज़ा ये है की
उसके सच का भी कोई एतबार नहीं करता।
(हज़रत अली)
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(13) अपने हमसफ़र से अपने जैसा होने की उम्मीद मत करो,
क्योंकि तुम किसी का सीधा हाथ अपने सीधे हाथ में पकड़कर उसके साथ नहीं चल सकते।
(हज़रत अली)
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(14) अगर दुनिया फ़तेह करना चाहते होतो,
अपनी आवाज़ मे नरम लहजा पैदा करो...
इसका असर तलवार से ज़्यादा होता है।
(हज़रत अली)
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(15) इन्सान का नुक़सान माल और जान के चले जान से नहीं होता,
बल्कि इंसान का सबसे बड़ा नुकसान किसी की नजर में गिर जाने से होता है।
(हज़रत अली)
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(16) लोगो को उसी तरह माफ़ करो,
जैसे तुम खुदा से उम्मीद रखते हो कि वह तुम्हे माफ करेगा।
(हज़रत अली)
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(17) कभी किसी के सामने अपनी सफाई पेश मत करो,
क्योंकि जिसे तुम पर यकीन है उसे जरुरत नहीं और जिसे तुम पर यकीन नहीं वो मानेगा नहीं।
(हज़रत अली)
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(18) जब अल्लाह किसी से नाराज होता है तो उसे ऐसी चीज़ की तलब में लगा देता है जो उसकी किस्मत में नहीं होती।
(हज़रत अली)
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(19) अगर दुनिया में सुकुँन होता तो अल्लाह को कौन याद करता।
सुकुँन तो सिर्फ उन लोगो के पास है जो लोग अल्लाह की रज़ा को अपनी रज़ा समझते है।
(हज़रत अली)
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(20) मैं खुदा से अक़्ल नहीं तक़दीर चाहता हुँ।
क्युँकि मैंने बहुत से अक़्ल मन्दोे को तक़दीर वालो की गुलामी करते देखा है।
(हज़रत अली)
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(21) किसी से मोहब्बत करने से पहले अपने दिल मे कब्रस्तान बनालो।
ताकि उसकी छोटी छोटी गलतियों को दफ़न कर सको।
(हज़रत अली)
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(22) हजरत अली से पूछा गया कि इंसान बुरा कब बनता है।
तो आपने फ़रमाया जब वह अपने आपको दूसरों से अच्छा समझने लगे।
(हज़रत अली)
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(23) अपने दुश्मन को हज़ार मौक़े दो कि वह तुम्हारा दोस्त बन जाए।
लेकिन अपने दोस्त को एक भी मौक़ा मत दो कि वह तुम्हारा दुश्मन बन जाए।
हज़रत अली
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(24) झूट बोलकर जीतने से बेहतर है कि सच बोलकर हार जाऐ।
(हज़रत अली)
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(25) अगर तुम किसी को छोटा देख रहे हो तो,
या तो तुम उसे दूर से देख रहे हो,
या तो तुम उसे गुरुर से देख रहे हो।
(हज़रत अली)
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(26) दर्द वो है जो दूसरों के दर्द को देख कर मिले।
वर्ना अपना दर्द तो जानवर को भी महसूस होता है।
(हज़रत इमाम हुसैन अ०स०)

हमसे है प्यार गर तो गुनाहों को छोड़ दो

शिक़वा-ए-हुसैन :-
— (सलमान रिज़वी सिरसिवी)

शब्बीर दे रहे हैं सदा हाले दिल सुनाऊँ।
आओ तुम्हें मैं मक़सदे इंसानियत बताऊँ।।
चौदह सौ साल पहले की फिर करबला दिखाऊँ।
घर बार लुट रहा है जहाँ तुमको लेके जाऊँ।।

सर काटने को ज़ुल्म के खंजर सवार हैं।
आले नबी के खून के प्यासे हज़ार हैं।।

जो है ख़ुदा की चाह वही मेरी चाह है।
उसपर चलो जो दीने मुहम्मद की राह है।।
इस बात का तो सारा ज़माना गवाह है।
भूकी है तीन रोज़ की प्यासी सिपाह है।।

अपने लिये तो कुछ भी नहीं कर रहे हैं हम।
इस्लाम की बक़ा के लिये मर रहे हैं हम।।

चलती हैं तेज़ दश्त में तीरों की आँधियाँ।
अकबर का खून पीने को बेकल हैं बरछियाँ।।
दिल है हमारा फरज़ो मुहब्बत के दरमियाँ।
लेकिन हमें ये सोच के देना है इम्तेहाँ।।

क़ल्बे रसूले हक़ में न कोई क़लक़ रहे।
अकबर मेरा रहे न रहे दीने हक़ रहे।।

क़ासिम का लाशा होता है पामाल होने दो।
रुसवा रसूले हक़ की हुयी आल होने दो।।
बच्चे हैं सारे प्यास से बेहाल होने दो।
मक़तल हमारे ख़ूँ से हुआ लाल होने दो।।

बैयत के हर सवाल की तरदीद के लिये।
सर देंगे हिफ़्ज़े कलमा ए तौहीद के लिये।।

पामाल क़ल्बे लैला की है आरज़ू तो क्या।
ज़ैनब हुयी है दश्त में बे आबरु तो क्या।।
नावक से छिद गया है पिसर का गुलू तो क्या।
बेशीर के लहू से किया है वुज़ू तो क्या।।

आईना हमने दीने नबी का दिखा दिया।
इंसानियत को फ़ख़्र से जीना सिखा दिया।।

खुद को जो कह रहे हो अज़ादारे शाहे दीं।
इस बात का हमें भी दिलाओ तो कुछ यकीं।।
सजदों के नूर से जो मुनव्वर नहीं जबीं।
दिल में हमारे आपकी ख़ातिर जगह नहीं।।

तोड़ो न क़ल्बे ज़हरा मेरे दिल को तोड़के।
आओ न मजलिसों में मुसल्लों को छोड़के।।

आते हैं हम भी देखने उठते हुए अलम।
बनते हैं बेनमाज़ी अलमदार बा हशम।।
मन्ज़र वो सोच सोचके होता है हमको ग़म।
क्या इनके वास्ते ही हुए थे शहीद हम।।

करते हैं ऐसे लोग जो मातम मेरा बपा।
लगता है जैसे काट रहा है कोई गला।।

झगड़े फ़साद आज रवाँ अंजुमन में हैं।
मजलिस में वाह वाही की रस्में चलन में हैं।।
अमराज़े बेहयायी बहुत मर्दो ज़न में हैं।
लगता है जैसे तीर अभी भी बदन में हैं।।

हमको जो दर्द देते हैं आमाल मत करो।
फिर से हमारे जिस्म को पामाल मत करो।।

है आपके तरीक़ा ए मातम में इख़्तेलाफ़।
आप एक के ख़िलाफ़ हैं एक आपके ख़िलाफ़।।
दिल से करो ये बुग्ज़ो अदावत की गर्द साफ़।
होता है ऐसी बातों क़ल्बे नबी शिगाफ़।।

रस्मों रिवायतों की रवानी में मत बहो।
आपस की फूट ख़त्म करो मुत्तहिद रहो।।

होती हैं मेरी याद में जो शब बेदारियाँ।
करते हैं सारी रात मेरा ज़िक्र मदह ख़ाँ।।
अज्रो सवाब इनका तुम्हें देगी मेरी माँ।
लेकिन ये बात क़ाबिले अहसास है यहाँ।।

मक़सद से क्यूँ हमारे फ़रामोश होते हो।
वक़्ते नमाज़ होते ही घर जाके सोते हो।।

फ़रशे अज़ा पे इतना तो रक्खा करो ख़्याल।
ज़हरा यहाँ पे आती हैं बिखराये अपने बाल।।
माएँ शरीक होती हैं उजड़े थे जिनके लाल।
हंसते हो और करते हो मक़सद को पायमाल।।

तफ़रीह और मज़ाक़ का नक़्शा बना दिया।
मजलिस को तुमने खेल तमाशा बना दिया।।

माहे अज़ा को रस्मों रिवायत समझ लिया।
मनमानियों को तुमने शरीयत समझ लिया।।
बस रोने को ही अज्रे रिसालत समझ लिया।
मजलिस को मेरी अपनी विरासत समझ लिया।।

करते हो मेरा ज़िक्र अगर नाम के लिये।
तय्यार रहना हश्र में अंजाम के लिये।।

नारे जो अलअजल के लगाते हो बार-बार।
करता है कोई ऐसे भी मौला का इंतेज़ार।।
मक़सद से मेरे दूर हो गफ़लत के हो शिकार।
लश्कर में कैसे मेहदी के हो आपका शुमार।।

लिल्लाह तुम फ़रेब की राहों को छोड़ दो।
हमसे है प्यार गर तो गुनाहों को छोड़ दो।।

उल्फ़त है तुमको हमसे मगर मारेफ़त नहीं।
तो ताज़ियाना समझो इसे ताज़ियत नहीं।
ये ज़ुल्म है हमारे लिये मरहमत नहीं।
ऐसी हुसैन वालो की होती सिफ़त नहीं।।

मक़सद हमारा क्या है ज़रा फ़िक़्र फिर करो।
पहले मुझे समझ लो मेरा ज़िक्र फिर करो।।

सलमान तुम भी अपने फरीज़े को जान लो।
कोई भी हक़ की बात कहे उसको मान लो।
इस्लाह अपने नफ़्स की करनी है ठान लो।
किरतास पर लिखो ये बसद आन बान लो।।

हो शायरी तो दीन के पैग़ाम के लिये।
वरना तो काम और भी हैं नाम के लिये।।

— सलमान रिज़वी सिरसिवी

हज़रत अली (अ) ने 1400 वर्ष पूर्व लागू की थी वृद्धा पेंशन योजना

*हज़रत अली (अ) ने 1400 वर्ष पूर्व लागू की थी वृद्धा पेंशन योजना*
अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली (अ) का गुज़र एक ऐसे बूढ़े आदमी के पास से हुआ जो लोगों से भीख मांग रहा था, हज़रत ने पूछा की ये कौन है ? आपके साथी ने कहा के: मौला यह एक ईसाइ है, हज़रत अली (अ) ने फ़रमायाः *इस आदमी से तुमने काम लिया और जब बूढ़ा और लाचार हो गया तो छोड दिया! जाओ बैतुलमाल (सरकारी ख़ज़ाने) से इसकी मदद करो।*
(वसायल अल शीया, जिल्द 15, पेज 66, बाब 19)

आइम्मा (अ) के लिए विलादत के बजाए ज़हूर या नुज़ूल लिखने के नुक़्सानात

*आइम्मा (अ) के लिए विलादत के बजाए ज़हूर या नुज़ूल लिखने के नुक़्सानात*
मौला की मुहब्बत में बाज़ लोग इतना आगे बढ़ गए के वो मासूमीन (अ) और उलोमा की सीरत को छोड कर अपनी मरज़ी से आइम्मा (अ) के लिए विलादत के बजाए ज़हूर या नुज़ूल लिखने लगे हैं जबके मासूमीन से जो रिवायतें मासूमीन की विलादत के बारे में किताबों में मिलती हैं उन सब में विलादत ही लिखा है, हमें ये कोई हक़ नहीं पहुंचता के हम इमामे मासूम से भी आगे बढ़ जाऐं हम किसी भी मासूम से न इतनी मुहब्बत कर सकते हैं जितनी एक मासूम दूसरे मासूम से करते थे और न हमें इतनी मारफ़त हो सकती है जितनी एक मासूम को दूसरे मासूम की थी इसके बावजूद भी एक मासूम ने दूसरे मासूम की विलादत के लिए ज़हूर या नुज़ूल का लफ़ज़ इस्तेमाल नहीं किया है।
अगर हम आइम्मा ए मासूम (अ) की विलादत को ज़हूर या नुज़ूल लिखना शूरु करदें तो इस से शीया मज़हब को बहूत सारे नुक़्सानात पंहुच सकते हैं।
वर्षों से वहाबी ये कोशिश कर रहे हैं के इमाम अली (अ) की ख़ाना ए काबा में विलादत की फ़ज़ीलत को कमरंग कर दिया जाए, लेकिन शिया उलोमा ने ऐसा होने नहीं दिया, मगर नुज़ूल या ज़हूर लिखने वाले़ वहाबियों की इस कोशिश को पानी दे रहें है और विलादत के बजाए ज़हूर या नुज़ूल लिख कर नादानिस्ता, वहाबियों को फ़ायदा पंहुचा रहे हैं, क्योंकि ज़ुहूर या नुज़ूल रायज होने से इमाम अली (अ) की मौलूदे काबा होने की फ़ज़ीलत ख़त्म हो जाएगी।
जब विलादत का इंकार कर दिया तो शहादत का भी इंकार होगा तो मक़ामाते मुक़द्देसा नजफ़, करबला, क़ुम, मशहद वग़ैरा की ज़ियारत और इजतमा की कोई अहमियत नहीं रहेगी और फिर ये सवाल भी होगा के जब कोई शहीद हुआ ही नहीं तो फिर इन ज़ियारतगाहों में कौन दफ़न है।?
ज़हूर या नुज़ूल कहने या लिखने के क़ायल अफराद को ज़ियारते वारेसा का इंकार करना पडेगा क्योंकि ज़ियारते वारेसा में मासूम (अ) फ़रामते हैं के: मैं गवाही देता हूँ के आप बुलंद तरीन सुल्बों और पाकीज़ा तरीन रहमों में नूरे इलाही बन कर रहे, और ये बात सब जानते हैं के सुल्ब और रहम का ताअल्लुक़ विलादत से होता है।
मासूम से मरवी रजब की दुआ कर इंकार करना पडेगा जिस में मासूम फ़रमाते हैं के: ऐ माबूद ! माहे रजब में मुतावल्लिद होने वाले 2 मौलूदों के वास्ते से सवाल करता हूँ जो इमाम मुहम्मद तक़ी (अ) और इमाम अली नक़ी (अ) बुलंद नसब वाले हैं, इन दोनों के वास्ते से तेरा बेहतरनी तक़र्रुब चाहता हूँ।
जब विलादत का इंकार किया जाएगा तो शहादत का इंकार भी करना पडेगा और जब शहादत का इंकार किया जाएगा तो मान्ना पड़ेगा के इमाम को शहीद करने वाला भी कोई नहीं था, लेहाज़ा ज़ालेमीन के ज़िम्मे आइम्मा का कोई ख़ून नहीं रहेगा।
वो तमाम दुआऐं और ज़ियारतें जो अक़ायद और मुआरिफ़ से भरी हुई हैं और जिन में ज़ालेमीन पर लआन ज़िक्र हुई है उनका इंकार कर दिया जाएगा, इस लिए के जब किसी ने शहीद ही नहीं किया तो लआन वो तआन क्यों ?
जब आइम्मा पैदा ही नहीं होते तो नस्ले सादात कहाँ से वजूद में आ गई ? क्या तमाम सादात का भी ज़हूर हो गया है ? इस अक़ीदे वाले को नस्ले सादात का इंकार करना पडेगा।
मासूम की विलादत का इंकार करने वालों को ईदे मीलादुन्नबी (स) का इंकार करना पड़ेगा और वहाबी यही चाहते हैं, क्योंकि तमाम मुसलमान नबी (स) की विलादत का जश्न मनाते हैं और आपके रोज़े विलादत को किसी ने भी ज़हूर या नुज़ूल से याद नहीं किया है।
ऐसा अक़ीदा रखने वालों को इमाम अली (अ) की एक ऐसी फ़ज़ीलत का इंकार करना पडेगा जिस में कोई दूसरा शरीक नहीं है और वो ‘‘ मौलूदे काबा ‘‘ होना है, अलबत्ता वहाबी इसका भी इंकार करते हैं।
जनाबे फ़ातेमा ज़हरा (अ) और दीगर आइम्मा ए मासूमन (अ) की इस फ़ज़ीलत के बारे में मरवी उन रिवायतों का इंकार करना पडेगा जिन में इन मासूमीन (अ) को शिकमे मादर में अपनी वालेदा से बातें करते हुए बताया गया है।
विलादत के बजाए ज़हूर इस्तेमाल होने लगे तो सब से बड़ा नुक़्सान ये होगा के लोगों के ज़हन में इमामे ज़माना (अ) के ज़हूर की जो ख़ुसूसियत है वो ख़त्म हो जाएगी।
(तालिबे दुआः पैग़ंबर नौगांवी)

Shao'or paak ho tab midhat e naqi hogi

*Shao'or paak ho tab midhat e naqi hogi*

1. Nazar me jiske zara azmate Naqi hogi
Ita'ate Ali aur ta'ate Naqi hogi

2. Rajab ke maah me hoga qamar ko rashq bahut
Zami'n ki god me jab surate Naqi hogi

3. Khilega chahra jo ibne taqi ki aamad par
Usi ke wasate bas qurbate Naqi hogi

4. Khayal e kham se koi sana nahi hoti
Shao'or paak ho tab midhat e naqi hogi

5. Zahoor Mehdi(AS) ka Zeeshan jab kabhi hoga
Usi ki zaat me sab seerate Naqi hogi

✍ Zeeshan Azmi

*شعور پاک ہو تب مدحتِ نقی ہوگی*

1. نظر میں جس کے ذرا عظمتِ نقی ہوگی
اطاعت علی اور طاعت نقی ہوگی

2. رجب کے ماہ میں ہوگا قمر کو رشک بہت
زمیں کی گود میں جب صورتِ نقی ہوگی

3. کھلیگا جہرہ جو ابن تقی  کی آمد پر
اسی کی واسطے بس قربتِ نقی ہوگی

4. خیالِ خام سے کوئی ثنا نہیں ہوتی
شعور پاک ہو تب مدحتِ نقی ہوگی

5.ظہور مہدی کا ذیشان جب کبھی ہوگا
اسی کی ذات میں سب سیرتِ نقی ہوگی

✍ ذیشان آعظمی

Qunoot in Juma Prayer ( Namaz)

دعائے قنوت جمعہ:
اللهم إن عبیدا من عبادک الصالحین قاموا بکتابک وسنۃ نبیک فاجزھم عنا خیر الجزاء.
Allahumma inna abeedam min ebadekas saleheen. Qaamoo bekitabeka wa sunnate nabbiyeka fajzehim khairal jazaa.

ترجمہ قنوت: پروردگار عالم! میں تیرے صالح بندوں میں سے ایک ناچیز بندہ ہوں. ہمیں اپنی کتاب اور نبی کی سنت پر قائم رکھ اور اچھی جزاء عطا فرما.