(नौजवानो क़ौम के समझो अज़ादारी है क्या)
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जाग जाओ गफ़लतो से सच से रिश्ता जोड़ दो,
जाल जो दुश्मन ने बुन रख्खा है उसको तोड़ दो,
जो ख़िलाफ़े मक़सदे शैह हैं वो रस्में छोड़ दो,
फिर ज़माने का हुसैन आयेगा तय्यारी करो...
जिससे राज़ी हों इमाम ऐसी अज़ादारी करो...
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भूल कर क्यूँ अपने मक़सद और हदफ़ को चल दिये,
छोड़कर इंसानियत की पाक सफ़ को चल दिये,
नौहाख्वानी करते ही घर की तरफ़ को चल दिये,
ज़ेहनियत कैसी अज़ादारों हमारी हो गयी...
मजलिसे शैह भी हमारी और तुम्हारी हो गयी...
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क्यूँ नहीं है आपको इस बात का हरगिज़ ख़्याल,
हक़ बयाँ करना हुआ जाता है अब हर दिन मुहाल,
हो रहा है मक़सदे शब्बीर यूँ भी पायमाल,
लोग दीने शाह को बेआबरू करने लगे...
बेनमाज़ी मिम्बरों से गुफ़्तुगू करने लगे...
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आ गया माहे अज़ा मसरूफ़ यूँ हम हो गये,
बन रहे हैं मजलिसों के वास्ते कपड़े नये,
क्या इमाम इसको अज़ादारी कहेंगे सोचिये,
जो हैं बेबुनियाद रस्में उनसे बेज़ारी करो...
मक़सदे शब्बीर की हद में अज़ादारी करो...
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नौहाख्वानी में कलाकारी कहाँ से आ गयी,
अंजुमनबाज़ी की बीमारी कहाँ से आ गयी,
बेनमाज़ी को अलमदारी कहाँ से आ गयी,
फ़ातेमा ज़हरा के फिर दिल को दुखाने आ गये...
बेनमाज़ी परचमे ग़ाज़ी उठाने आ गये...
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देखिये जिस जाँ मुहर्रम की नज़र आती है धूम,
आ रहे हैं हम जुलूसों में लगाकर परफ़्यूम,
मजलिसे सरवर नज़र आने लगी मिस्ले हुजूम,
याद रस्मों को रखा पामाल मक़सद कर दिया...
जब जहाँ चाहा वहाँ परचम बरआमद कर दिया...
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मक़सदे शब्बीर तो शायद नहीं है हमको याद,
कर रहे हैं मजलिसों मातम में हम झगड़ा फ़साद,
और फिर उसपे ये नारा सुन्नी-शीया इत्तेहाद,
क्या कभी सोचा है ऐसे इत्तेहाद हो जायेगा...
फूट जब आपस में है तो ग़ैर कैसे आयेगा...
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शाह का हम ग़म मनायें तो इबादत जान कर,
हम हैं ज़हरा की दुआ ये मरतबा पहचान कर,
जो फ़क़ीहे क़ौम कहदे बात उसकी मान कर,
मुश्तहिद के क़ौल में टकराव न तफरीक़ हो...
अक़्ल के मीज़ान में हर बात की तस्दीक़ हो...
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जिस तरफ़ देखो जुलूसों की उधर भरमार है,
ये अज़ादारी नहीं है रस्मों का त्यौहार है,
आज अपनी क़ौम को इस्लाह की दरकार है,
ये अज़ादारी हमारी ज़िन्दगी पे क़र्ज़ है...
पुरख़ुलूस इसको मनाना ही हमारा फ़र्ज़ है...
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आ रहे हैं मिम्बरे शब्बीर पे कुछ बेहया,
दे रहे हैं नौजवानों को नई एक करबला,
मुनकिरे इस्लाम हैं ये इनको तुम समझो ज़रा,
दुश्मने शब्बीर को दीं का सबक़ किसने दिया...
मिम्बरों पे बैठने का इनको हक़ किसने दिया...
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मिम्बरों से बैठकर वो पुरअसर तक़रीर हो,
सुनने वालों के दिलों में करबला तामीर हो,
मक़सदे शब्बीर की पेशे नज़र तस्वीर हो,
बात है कड़वी मगर हक़ का बयाँ है दोस्तों...
जो न दे पैग़ाम वो मजलिस कहाँ है दोस्तों...
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ख़ुदपसन्दी जिसमें हो शामिल अज़ादारी कहाँ,
जिससे हो इस्लाम को मुश्किल अज़ादारी कहाँ,
जो नमाज़ों से करे ग़ाफ़िल अज़ादारी कहाँ,
कह रहे हैं आज भी मक़तल से अनसारे हुसैन...
बेनमाज़ी हो नहीं सकता अज़ादारे हुसैन...
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ज़िक्र है पाकीज़ा इसमें गन्दगी अच्छी नहीं,
मजलिसों के नाम पर आवारगी अच्छी नहीं,
ऐ कनीज़े फ़ातेमा बेपर्दगी अच्छी नहीं,
जो दिले ज़हरा पे हैं उन ज़ख़्मों का मरहम करो...
जिस तरह ज़ैनब ने बतलाया है वैसे गम करो...
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सिर्फ़ रोना और रुलाना ही अज़ादारी नहीं,
मजलिसों में आना जाना ही अज़ादारी नहीं,
परचमे ग़ाज़ी उठाना ही अज़ादारी नहीं,
जिसकी हरएक साँस में शामिल है किरदारे हुसैन.
बस हक़ीक़त में वो ही होगा अज़ादारे हुसैन...
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टूटने पाये नहीं शब्बीर की उम्मीदो आस,
तक़वा ओ ईमान का हम पहनकर निकलें लिबास,
आज है "सलमान" की सब शायरों से इलतेमास,
मरतबा पहचानों अपना शाह के मद्दाह हो...
शायरी ऐसी हो जिससे क़ौम की इस्लाह हो...
(नौजवानों क़ौम के समझो अज़ादारी है क्या)
(अगर इन अशआर से किन्हीं हज़रात की दिल आज़ारी होती है तो उसके लिये माफ़ी चाहता हूँ और ख़ुदा वन्दे करीम से दुआ करता हूँ के हमें मक़सदे शब्बीर पर अमल करते हुए अज़ादारी करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाये... आमीन)
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"सलमान रिज़वी सिरसिवी"