ओवैसे क़र्नी ने अपने दाँत तोड़ लिए थ

कुछ ज़ाकेरीन मुहर्रम में इस दास्तान को ज़रुर पढ़ते हैं केः *इशक़े रसूल (स) में ओवैसे क़र्नी ने अपने दाँत तोड़ लिए थे।*, इस दास्तान में ग़ौर करने के बाद कुछ बातें ज़हन में आती हैं जिस से ये दास्तान ग़ैर मोतबर मालूम होती हैः
1- उलोमा वो मोहक़्क़ेक़ीन ने इस दास्तान को अपनी किताबों में नहीं लिखा है।
2- अत्तार नैशापुरी सूफ़ी ने इस दास्तान को अपनी किताब *तज़करा तुल औलिया* में नक़्ल किया है जिस पर हम भरोसा नहीं कर सकते क्येंकि सूफ़ी ग़ुलू से काम लेते हैं।
3- अगर इस दास्तान पर भरोसा करलें तो फिर ओवैसे क़र्नी को इमाम अली (अ) से अफ़ज़ल मान्ना पड़ेगा।
4- शिया मज़हब में मासूम का काम हुज्जत होता है, सहाबी या ताबेई का नहीं, ओवैसे क़र्नी ताबेई थे और इमाम अली (अ) मासूम थे, इमाम अली (अ) ने तो अपने दाँत नहीं तोड़े।
5- ओवैसे क़र्नी वहाँ मौजूद नहीं थे बलके यमन में थे तो फ़ौरन उन्हें किस तरह मालूम हो गया के रसूले अकरम (स) का दंदाने मुबारक शहीद हो गया है। ?
6- ओवैसे क़र्नी ने अपने दाँत किस तरह तोड़े ? पत्थर से टूट नहीं सकते क्योंकि अगर पत्थर का टुकड़ा छोटा होगा तो दाँत टूटेगा नहीं और अगर बड़ा होगा तो दाँत से पहले होंट ख़त्म हो जाऐंगे। !