यज़ीद के दरबार में हज़रत ज़ैनब का ऐतिहासिक खुतबा

यज़ीद के दरबार में हज़रत ज़ैनब का ऐतिहासिक खुतबा

हे यज़ीद! क्या अब जब कि ज़मीन और आसमान को तूने (विभिन्न दिशाओं से) हम पर तंग कर दिया और और क़ैदियों की भाति हम को हर दिशा में घुमाया, तू समझता है कि हम ईश्वर के नज़दीक अपमानित हो गए और तू उसके नज़दीक सम्मानित हो जाएगा?
सैय्यद ताजदार हुसैन ज़ैदी

यज़ीद के दरबार में जब हज़रत ज़ैनब (स) की निगाह अपने भाई हुसैन के ख़ून से रंगे सर पर पड़ी तो उन्होंने दुख भरी आवाज़ में जो दिलों की दहला रही थी पुकाराः

«يا حُسَيْناهُ! يا حَبيبَ رَسُولِ اللهِ! يَابْنَ مَكَّةَ وَ مِنى، يَابْنَ فاطِمَةَ الزَّهْراءِ سَيِّدَةَ النِّساءِ، يَابْنَ بِنْتِ الْمُصْطَفى»

हे हुसैन, हे रसूलुल्लाह (स) के चहीते, हे मक्का और मिला के बेटे, हे सारे संसार की महिलाओं की मलिका फ़ातेमा ज़हरा (स) के बेटे हो मोहम्मद मुस्तफ़ा (स) की बेटी के बेटे।

रावी कहता हैः ईश्वर की सौगंध हज़रत ज़ैनब (स) की इस आवाज़ को सुनकर दरबार में उपस्थित हर व्यक्ति रोने लगा, और यज़ीद चुप था!!

यज़ीद ने आदेश दिया की उसकी छड़ी लाई जाए और वह उस छड़ी से इमाम हुसैन (अ) के होठों और पवित्र दांतो से मार रहा था।

अबू बरज़ा असलमी जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) के सहाबी और उस दरबार में उपस्थित थे, ने यज़ीद को संबोधित करके कहाः हे यहीं तू अपनी छड़ी से फ़ातेमा (स) के बेटे हुसैन (अ) को मार रहा है? मैंने अपनी आँखों से देखा है कि पैग़म्बरे अकरम (स) हसन (अ) और हुसैन (अ) के होठों और दांतों को चूमा करते थे और फ़रमाते थेः

:«أَنْتُما سَيِّدا شَبابِ أهْلِ الْجَنَّةِ، فَقَتَلَ اللهُ قاتِلَكُما وَلَعَنَهُ، وَأَعَدَّلَهُ جَهَنَّمَ َوساءَتْ مَصيراً»

तुम दोनों स्वर्ग के जवानों के सरदार हो, ईश्वर तुम्हारे हत्यारे को मारे और उसपर लानत करे और उसके लिए नर्क तैयार करे और वह सबरे बुरा स्थान है।

यज़ीद ने जब असलमी की इन बातों को सुना तो क्रोधित हो गया और उसने आदेश दिया कि उनको दरबार से बाहर निकाल दिया जाए।

यज़ीद जो घमंड और अहंकार से चूर था, यह समझ रहा था कि उनसे कर्बला पर विजय प्राप्त कर ली है, उसने इन शेरों को पढ़ा जो उसके और बनी उमय्या के इस्लाम से दूर होने और इस्लामी शिक्षाओं को स्वीकार न करने का प्रमाण हैं:

لَيْتَ أَشْياخي بِبَدْر شَهِدُوا *** جَزِعَ الْخَزْرَجُ مِنْ وَقْعِ الاَْسَلْ

فَأَهَلُّوا وَ اسْتَهَلُّوا فَرَحاً *** ثُمَّ قالُوا يايَزيدُ لاتَشَلْ

لَسْتُ مِنْ خِنْدَفَ إِنْ لَمْ أَنْتَقِمْ *** مِنْ بَني أَحْمَدَ، ما كـانَ فَعَلْ(1)

काश मेरे वह पूर्वज जो बद्र के युद्ध में मारे गए थे आज देखते कि ख़ज़रज क़बीला किस प्रकार भालों के वार से रो रहा है।

वह लोग शुख़ी से चिल्लाह रहे थे और कह रहे थेः यज़ीद तेरे हाथ सलामत रहें!

मैं ख़िनदफ़ (2) की संतान नहीं हूँ अगर मैं अहमद (अल्लाह के रसूल (स)) के परिवार से इंतेक़ाम न लूँ

यज़ीद यह शेर पढ़ता जा रहा था और अपनी इस्लाम से दूरी और शत्रुता को दिखाता जा रहा था, और यही वह समय था कि जब अली (अ) की शेरदिल बेटी ज़ैनब (स) उठती है और वह एतिहासिक ख़ुत्बा पढ़ती हैं जिसे इतिहास कभी भुला न सकेगा। आप फ़रमाती हैं

«أَلْحَمْدُللهِِ رَبِّ الْعالَمينَ، وَصَلَّى اللهُ عَلى رَسُولِهِ وَآلِهِ أجْمَعينَ، صَدَقَ اللهُ كَذلِكَ يَقُولُ: ثُمَّ كَانَ عَاقِبَةَ الَّذِينَ أَسَاءُوا السُّوأَى أَنْ كَذَّبُوا بِآيَاتِ اللهِ وَكَانُوا بِهَا يَسْتَهْزِئُون. (3)

أَظَنَنْتَ يا يَزِيدُ حَيْثُ أَخَذْتَ عَلَيْنا أَقْطارَ الاَْرْضِ وَآفاقَ السَّماءِ، فَأَصْبَحْنا نُساقُ كَما تسُاقُ الأُسارى أَنَّ بِنا عَلَى اللهِ هَواناً، وَبِكَ عَلَيْهِ كَرامَةً وَأَنَّ ذلِكَ لِعِظَمِ خَطَرِكَ عِنْدَهُ، فَشَمَخْتَ بِأَنْفِكَ، وَنَظَرْتَ فِي عِطْفِكَ جَذْلانَ مَسْرُوراً حِينَ رَأَيْتَ الدُّنْيا لَكَ مُسْتَوْثِقَةٌ وَالاُْمُورَ مُتَّسِقَةٌ وَحِينَ صَفا لَكَ مُلْكُنا وَسُلْطانُنا، فَمَهْلاً مَهْلاً، أَنَسِيتَ قَوْلَ اللهِ عَزَّوَجَلَّ: وَ لاَ يَحْسَبَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا أَنَّمَا نُمْلِى لَهُمْ خَيْرٌ لاَِّنْفُسِهِمْ إِنَّمَا نُمْلِي لَهُمْ لِيَزْدَادُوا إِثْماً وَ لَهُمْ عَذَابٌ مُهِينٌ». (4)

प्रशंसा विशेष है उस ईश्वर के लिये जो संसारों का पालने वाला है, और ईश्वर की सलवात उसके दूत पर और उसके परिवार पर। ईश्वर ने सत्य कहा जब फ़रमायाः “वह लोग जिन्होंने पाप और कुकर्म किये उनका अंत (परिणाम) इस स्थान तक पहुँच गया कि उन्होंने ईश्वरीय आयतों को झुठलाना दिया और उनका उपहास किया”

हे यज़ीद! क्या अब जब कि ज़मीन और आसमान को तूने (विभिन्न दिशाओं से) हम पर तंग कर दिया और और क़ैदियों की भाति हम को हर दिशा में घुमाया, तू समझता है कि हम ईश्वर के नज़दीक अपमानित हो गए और तू उसके नज़दीक सम्मानित हो जाएगा? और तू